स्टालिन को मात देने के लिए BJP और AIADMK मिलाएंगे हाथ? , राजनीतिक मे बदलाव होते रहते हैं: ई पलानीस्वामी

नई दिल्ली
तमिलनाडु में सियासी पार हाई है। पिछले कुछ दिनों से परिसीमन और ट्राइल लैंग्वेज पॉलिसी को लेकर डीएमके और भाजपा आमने सामने है। अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव है। एक तरफ जहां, भाजपा और डीएमके नेताओं के बीच तीखी नोकझोंक चल रही है। वहीं, दूसरी ओर AIADMK आगामी विधानसभा चुनाव की प्लानिंग में जुट गई है। भाजपा और डीएमके के बीच चल रही सियासी संघर्ष पर AIADMK की पैनी नजर है।

क्या हो सकती है भाजपा-AIADMK में गठबंधन?
अटकलें लगाई जा रही है कि AIADMK और भाजपा के बीच गठबंधन हो सकती है। हालांकि, एआईएडीएमके नेता ई पलानीस्वामी ने अभी इस मामले पर चुप्पी साध रखी है। हाल ही में ई पलानीस्वामी और अमित शाह की मुलाकात हुई थी। मीडिया से बात करते हुए AIADMK नेता ने कहा कि गठबंधन पर कोई भी फैसला चुनावों के करीब आने पर लिया जाएगा। "यह राजनीति है, राजनीतिक स्थिति के अनुसार बदलाव होते रहेंगे। उन्होंने आगे कहा,"हम अभी कैसे बता सकते हैं? 2019 के चुनाव के समय हमने कब गठबंधन किया था? फरवरी में हमने घोषणा की थी। इसी तरह, हम समान विचारधारा वाले दलों से बात करेंगे और चुनाव नजदीक आने पर गठबंधन पर फैसला लेंगे।"

ट्राई लैंग्वेज पॉलिसी पर क्या बोली AIADMK?
एआईएडीएमके नेता ई पलानीस्वामी ने कहा, तमिलनाडु के छात्रों के लिए दो-भाषा फॉर्मूले पर AIADMK का रुख भी स्पष्ट है। उन्होंने कहा, "दो-भाषा (फॉर्मूला) सीएन अन्नादुरई, एमजीआर और अम्मा (जे जयललिता) के समय से AIADMK से चलती आई है। इसे तमिलनाडु में जारी रहना चाहिए।" एआईएडीएमके और भाजपा के बीच चुनावी साझेदारी का लंबा इतिहास रहा है, जिसमें कई बार टूट-फूट और सुलह हुई है। 1998 के आम चुनाव में जे जयललिता की अगुवाई वाली पार्टी ने भाजपा के साथ गठबंधन किया था और राज्य में 39 में से 30 सीटें जीती थीं।

AIADMK और भाजपा के गठबंधन का इतिहास
हालांकि, अगले साल एआईएडीएमके ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया, ऐसा तब हुआ जब श्री वाजपेयी ने तमिलनाडु में डीएमके सरकार को बर्खास्त करने से इनकार कर दिया था।  इसके बाद 2004 के लोकसभा चुनावों में भाजपा और AIADMK के बीच गठबंधन हुआ था, लेकिन एआईएडीएमके ने सिर्फ एक सीट जीती, जबकि राज्य में भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली थी।

नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के तहत अब देश के हर राज्य में सभी छात्रों को तीन भाषाएं सीखनी होंगी। इनमें से एक हिंदी हो सकती है। हालांकि, यह तय करने का अधिकार शिक्षण संस्थाओं के पास होगा कि वे कौन सी तीन भाषाएं पढ़ाएंग। पॉलिसी में सिफारिश की गई है कि छात्र-छात्राओं को तीन भाषाएं सीखनी होंगी।

स्टालिन सरकार इस पॉलिसी की खिलाफत कर रही है। उनका कहना है कि भाजपा जबरदस्ती राज्य पर हिंदी नहीं थोप सकती है। स्टालिन ने कहा कि जिन-जिन राज्यों में हिंदी को थोपा गया, वहां की क्षेत्रीय भाषा खत्म हो गई।

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