बस्तर की गौरवशाली संस्कृति को वैश्विक पटल पर पहुँचाने की पहल – उप मुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा

रायपुर

बस्तर की समृद्ध जनजातीय कला एवं संस्कृति की अनुपम छटा बस्तर पंडुम में बिखर रही है। बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित कर इसे देश और वैश्विक पटल पर रखने के लिए तीन दिवसीय बस्तर पंडुम 2025 आयोजन किया जा रहा है। उप मुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा और वनमंत्री श्री केदार कश्यप ने आज इस आयोजन का शुभारंभ किया। बस्तर पंडुम में रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अलावा परंपरा रीति-रिवाज, खान-पान, दुर्लभ वाद्य यंत्र, विभिन्न नाट्य विधाओं आदि का प्रदर्शन किया जा रहा है।

बस्तर पंडुम के शुभारंभ समारोह को सम्बोधित करते हुए उप मुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा ने कहा कि नवरात्रि के अवसर पर बस्तर की गौरवशाली संस्कृति को सहेजने और संवारने सहित वैश्विक पटल पर पहुंचाने के लिए सरकार ने बस्तर पंडुम का आयोजन किया है। जिससे बस्तर की संस्कृति, परंपरा को दुनिया के लोगों को जानने-समझने का अवसर मिलेगा। बस्तर अद्भुत सांस्कृतिक परम्परा, रीति रिवाज और जनजातीय व्यंजन से समृद्ध है। वनमंत्री श्री केदार कश्यप ने कहा कि बस्तर पंडुम की चर्चा देश-विदेश में हो रही है। बस्तर क्षेत्र के स्थानीय व्यंजन, वेशभूषा- आभूषण जोे विलुप्तप्राय हैं ऐसी समृद्ध संस्कृति को बचाने की पहल बस्तर पंडुम के माध्यम से की  जा रही है। उन्होंने दंतेवाड़ा का फाल्गुन मंडई और बस्तर में आयोजित बस्तर दशहरा को सामाजिक समरसता का प्रतीक निरूपित करते हुए कहा कि समाज के लोग इस परंपरा को संवर्धित कर रहे हैं।

कार्यक्रम को विधायक श्री चौतराम अटामी, जिला पंचायत अध्यक्ष श्री नंदलाल मुड़ामी ने भी संबोधित किया। संस्कृति विभाग के संचालक श्री विवेक आचार्य ने कार्यक्रम की रूपरेखा की जानकारी दी। इस अवसर पर नगर पालिका अध्यक्ष श्रीमती पायल गुप्ता, महिला आयोग की सदस्य श्रीमती ओजस्वी मंडावी सहित अन्य जनप्रतिनिधि सहित अन्य गणमान्य जन उपस्थित रहे।

जनजातीय नृत्य और गीत की प्रस्तुति

बस्तर पंडुम 2025 के अन्तर्गत सात विधाएं शामिल की गई है। जिसमें संभाग के सातों जिलों के विजेताओं के मध्य प्रतियोगिता आयोजित किया जा रहा है। जनजातीय नृत्यों के तहत गेड़ी, गौर-माड़िया, ककसाड़, मांदरी, हुलकीपाटा, परब सहित लोक गीत श्रृंखला के तहत जनजातीय गीत-चौतपरब, लेजा, जगारगीत, धनकुल, हुलकी पाटा (रीति-रिवाज, तीज त्यौहार, विवाह पद्धति एवं नामकरण संस्कार आदि) जनजातीय नाट्य श्रेणी में भतरा नाट्य की प्रस्तुति दी गई।

पारंपरिक वाद्य, वेशभूषा एवं आभूषण

जनजातीय वाद्य यंत्रों का प्रदर्शन के तहत धनकुल, ढोल, चिटकुल, तोड़ी, अकुम, झाब, मांदर, मृदंग, बिरिया ढोल, सारंगी, गुदुम, मोहरी, सुलुङ, मुंडाबाजा, चिकारा शामिल रहे। जनजातीय वेशभूषा एवं आभूषण का प्रदर्शन विधा में लुरकी, करधन, सुतिया, पैरी, बाहूंटा, बिछिया. ऐंठी, बन्धा, फुली, धमेल, नांगमोरी, खोचनी, मुंदरी, सुर्रा, सुता, पटा, पुतरी, नकबेसर जैसे आभूषण प्रदर्शित किए गए।

जनजातीय शिल्प, चित्रकला और व्यंजन

जनजातीय शिल्प एवं चित्रकला के अंतर्गत घड़वा, माटी कला, काष्ठ, ढोकरा, लौह प्रस्तर, गोदना, भित्तीचित्र, शीशल, कौड़ी शिल्प, बांस की कंघी, गीकी (चटाई), घास के दानों की माला प्रदर्शन किया गया। जनजातीय पेय पदार्थ एवं व्यंजन का प्रदर्शन-सल्फी, ताड़ी, छिंदरस, लांदा, कोसरा, जोन्धरा एवं मड़िया पेज, चापड़ा चटनी, सुक्सी पुड़गा, मछरी पुड़गा,मछरी झोर, आमट साग, तिखुर, बोबो इत्यादि का प्रदर्शन किया जा रहा है।

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