रायपुर का मामला: बाल श्रमिक के नाम पर उगाही में लगे है अधिकारी…

 
रायपुर

 बालश्रम आज के समय में एक अत्यंत ही चिंता जनक विषय है। जिसपर रोक लगाना बेहद ही जरुरी है। लेकिन जब बालश्रम रोकने वाले ही अधिकारी कर्मचारी ही अपने कर्तव्यों का निवर्हन पूरी ईमानदारी से नहीं करेंगे तब तक इस बाल मजदूरी पर रोक लगाना मुश्किल ही नहीं असंभव भी नजर आ रहा है।

मिली जानकारी के अनुसार राजधानी रायपुर से लगे ग्राम कुथरेल में जिला बाल संरक्षण इकाई महिला एवं बाल विकास विभाग के संजय निराला एवं श्रम विभाग तथा बचपन बचाओ आंदोलन समिति के संयुक्त टीम द्वारा चलाये गए एक अभियान के तहत धरसीवां स्थित संभव स्टील प्लांट से तथाकथित 4 बालश्रम में संलग्न बालकों का रेस्क्यू कर बाल कल्याण समिति (cwc) के समक्ष प्रस्तुत किया गया। समिति के आदेश अनुसार बालकों को शासकीय बालगृह रायपुर में सुरक्षा संरक्षण और आश्रय में उपलब्ध कराया गया। इस मामले में प्लांट प्रबंधन के खिलाफ बाल श्रम अधिनियम में निहित प्रावधान, किशोर न्याय अधिनियम बालकों की देखरेख संरक्षण अधिनियम 2015, भारतीय न्याय संहिता में दिए गए प्रावधान के अनुसार कार्यवाही करने के साथ-साथ एट्रोसिटी एक्ट के तहत सख्त कार्रवाई किए जाने हेतु थाना धरसीवा में प्लांट प्रबंधन और ठेकेदार के के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराने आवेदन प्रस्तुत किया गया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यह उठता है कि जब 4 मई को जिला बाल संरक्षण इकाई महिला एवं बाल विकास विभाग के संजय निराला एवं श्रम विभाग तथा बचपन बचाओ आंदोलन समिति के द्वारा इन बच्चो को रेस्क्यू कर लिया गया था तो इसकी सुचना सम्बंधित थाने में क्यों नहीं दी गई थी और जब मीडिया द्वारा इस मामले को लेकर सम्बंधित अधिकारी संजय निराला से संपर्क किया तो उन्होंने गोलमोल जवाब देते हुए थाना प्रभारी कि अनुपस्तिथि के कारण इस मामले कि सुचना नहीं दिए जाने का हवाला दिया गया है।

इसके साथ ही अन्य छोड़े गए 8 बच्चो को जिला बाल संरक्षण इकाई महिला एवं बाल विकास विभाग के संजय निराला एवं श्रम विभाग तथा बचपन बचाओ आंदोलन समिति के द्वारा किस आधार पर उन्हें छोड़ा गया है यह भी एक सोचनीय विषय है। झारखंड से आये दो बच्चो के परिजनों ने मिडिया के समक्ष बतलाया कि हमारे पास जो भी प्रमाण पात्र है उसके आधार पर मेरा पुत्र 18 वर्ष से अधिक का है लेकिन सम्बंधित दस्तावेजों को फर्जी बतलाकर हमारे बच्चो को रिहा करने से मना किया जा रहा है। उनका कहना है कि जिला बाल संरक्षण इकाई महिला एवं बाल विकास विभाग के संजय निराला एवं श्रम विभाग तथा बचपन बचाओ आंदोलन समिति सदस्यों द्वारा अवैध रूप से हमारे बच्चो को अपने कब्जे में पिछले 20 दिनों से रखे हुए है जबकि CWC के प्रथमन्ययाधीश महोदय से मीडिया कर्मियों ने मुलाकात कर इस मामले कि जानकारी ली तो उन्होंने बतलाया कि ये प्रक्रिया मात्र दो दिन कि होती है संजय निराला द्वारा किस आधार पर इन बच्चो को अभी तक अपने पास रखे हुए है ये समझ से परे है। इसके साथ ही जब बच्चो को चार मई को रेस्क्यू करके लाया गया था तो संजय निराला द्वारा किसका इंतज़ार किया जा रहा था कि उन्होंने इसका अपराध 20 मई को सिलतरा चौकी (धरसींवा थाना) में दर्ज कराई गई। क्या संजय निराला के द्वारा किसी का इन्तजार किया जा रहा था। संजय निराला के कार्यालय में कार्यरत कुछ हमारे सूत्रों ने स्वयं हमारे संवादाता से संपर्क करके एक चौकाने वाले मामले कि जानकारी दी है कि संजय निराला के द्वारा कुछ दिन पूर्व ही एक पास्को एक्ट के मामले में आरोपी से लम्बा लेनदेन करके उसको (आरोपी) रिहा कर दिया गया था। अब देखने वाली बात तो यह होगी कि इस तरह के अधिकारी को विभाग के द्वारा कब तक बचाया जाता रहेगा या फिर इस तरह बाल संरक्षण का आड़ लेकर यह अवैध उगाही का खेल जारी रहेगा।

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