गुयाना, सोमालिया और अफ्रीका के देशों में बालाघाट चावल का क्रेज, सेहत के लिए भी रामबाण

बालाघाट
 वे लोग जो चावल खाने के शौकीन हैं लेकिन बीमारियों की वजह से नहीं खा पाते उनके लिए खास तरह का पारबॉइल्ड चावल बेहद कारगर होता है. खास बात यह है कि मध्य प्रदेश के बालाघाट के किसान इसको अपने खेतों में उगा रहे हैं, जिसकी डिमांड दुनिया भर के कई देशों में हो रही है. आइए जानते हैं इस खास किस्म में चावल की क्या हैं खासियतें-

मध्य प्रदेश में धान का कटोरा, विदेशों में चावल की माँग

बालाघाट जिसे घाटों वाला जिला भी कहा जाता है यहां पैदा होने वाले चावल की मांग भारत के अलावा विदेशों में भी बढ़ी है. जिले का पारबॉइल्ड चावल अफ्रीकी और खाड़ी देशों में विशेष रूप से पसंद किया जाता है. IR-64 किस्म के धान से बने चावल की गुयाना, सोमालिया, बेनिन, टोगो जैसे अफ्रीकी देशों में काफी डिमांड है.

क्या होता है पारबॉइल्ड चावल

बालाघाट राइस मिलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मोनू भगत ने बताया "पारबॉइल्ड चावल ऐसे चावल होते हैं जो आंशिक रूप से चावल के भूसे के अंदर ही उबाल दिए जाते हैं. इसके तीन मेन स्टेप्स में इन्हें धोना, स्टीम करना और ड्राई करना शामिल होता है. मोटे पारबॉइल्ड चावल की सबसे ज्यादा डिमांड विदेशों में है जो IR-64 और IR-36 धान से बनता है."

मप्र में धान का कटोरा है बालघाट

बालाघाट के उपसंचालक कृषि फूल सिंह मालवीय ने बताया "बालाघाट में 2.67 लाख हेक्टेयर भूमि पर धान का उत्पादन होता है, जिसमें लगभग 82,77,000 क्विंटल धान पैदा होती है. बालाघाट को "प्रदेश का धान का कटोरा" भी कहा जाता है और यहां की अर्थव्यवस्था धान की खेती पर ही निर्भर है. किसानों से यहां की राइस मिल के व्यापारी और मप्र सरकार धान की खरीदी करती है. फिर से मिलों के ज़रिए चावल बनाकर तैयार किया जाता है."

मप्र में चिन्नौर धान को मिला है जीआई टैग

केंद्र सरकार की "एक जिला, एक उत्पाद" योजना में शामिल होने वाली चिन्नौर धान मध्य प्रदेश से जीआई टैग प्राप्त करने वाली पहली चावल की किस्म है. जीआई टैग से इसका अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रचार हो रहा है. इसे 14 सितंबर 2021 को भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री द्वारा मान्यता दी गई थी. यह मध्य प्रदेश का पहला चावल है जिसे जीआई टैग मिला और इसने बालाघाट को पहचान दी. 

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