एमपी में पीएम स्वनिधि 2.0: स्ट्रीट वेंडर्स को मिलेगा ब्याज मुक्त लोन, बैंक लौटाएंगे काटी गई राशि

भोपाल 

 मध्यप्रदेश के लाखों स्ट्रीट वेंडर्स (रेहड़ी-पटरी वालों) के लिए बड़ी खबर है। मुख्यमंत्री की पहल पर राज्य में 'पीएम स्वनिधि 2.0' के तहत लोन नियमों में बड़ा सुधार किया गया है। अब बैंकों की मनमानी पर लगाम लगेगी और हितग्राहियों को बिना किसी कटौती के पूरा लोन उपलब्ध कराया जाएगा। राज्य सरकार ने 14 फीसदी की ब्याज दर पर सहमति देते हुए करोड़ों रुपये के रिफंड का रास्ता भी साफ कर दिया है। साथ ही समय पर लोन चुकाने वाले वेंडर्स को 50 हजार रुपए तक की अगली लोन लिमिट का लाभ मिलेगा।
अब स्ट्रीट वेंडर्स को मिलेगी पूरी लोन राशि

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी 'पीएम स्वनिधि योजना' को लेकर मध्यप्रदेश सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। अब प्रदेश के छोटे व्यापारियों और रेहड़ी-पटरी वालों को बैंकों द्वारा ब्याज की रकम काटकर लोन देने की समस्या से मुक्ति मिलेगी। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के अनुसार, बैंकों ने पूर्व में हितग्राहियों के लोन से जो ब्याज की राशि काटी थी, उसे अब वापस लौटाया जाएगा। यह कुल राशि लगभग 120 करोड़ रुपए है।

दरअसल, पीएम स्वनिधि योजना ऐसे छोटे स्ट्रीट वेंडर्स के लिए हैं, जिन्हें अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए छोटे लोन की जरूरत पड़ती है। योजना के तहत केंद्र 7 फीसदी ब्याज सब्सिडी देता है और बैंक का बाकी बचा ब्याज अनुदान मप्र सरकार देती है। हितग्राहियों को शून्य ब्याज पर पूरी रकम देने का प्रावधान है, लेकिन कुछ बैंक हितग्राहियों को ब्याज की रकम काटकर ये राशि दे रहे थे।

सूत्र बताते हैं कि इसकी वजह से हितग्राहियों का योजना से मोहभंग हो रहा था। इसे देखते हुए राज्य सरकार की तरफ से वित्त मंत्रालय को पत्र लिखा गया। मंत्रालय ने राज्य सरकार से अपर कैप लगाने की सहमति दे दी है यानी अब हितग्राहियों को 14 फीसदी ब्याज दर पर ही लोन मिलेगा और बैंक बिना ब्याज काटे ये राशि हितग्राहियों को देंगे। 

14% ब्याज दर पर मिलेगा लोन

दरअसल, केंद्र सरकार इस योजना में 7 प्रतिशत की ब्याज सब्सिडी देती है, जबकि शेष ब्याज का भुगतान मध्यप्रदेश सरकार करती है। प्रावधान के अनुसार, हितग्राहियों को यह लोन 'शून्य ब्याज' पर मिलना चाहिए। लेकिन बैंक अपनी सुरक्षा के लिए पहले ही ब्याज की रकम काटकर लोन दे रहे थे, जिससे छोटे व्यापारियों का नुकसान हो रहा था। अब राज्य सरकार ने वित्त मंत्रालय की सहमति से 14% ब्याज की 'अपर कैप' लगा दी है। इसका मतलब है कि अब बैंक बिना किसी कटौती के पूरी राशि वेंडर को देंगे और ब्याज का भुगतान सरकार करेगी।

पीएम स्वनिधि योजना में एमपी नंबर-1

दरअसल, पूरे देश में प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना के क्रियान्वयन में मध्यप्रदेश ने प्रथम स्थान हासिल किया है। सितंबर 2025 तक के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश ने अब तक 13 लाख 46 हजार से अधिक रेहड़ी-पटरी वालों और छोटे व्यापारियों को इस योजना से जोड़कर रिकॉर्ड बनाया है। राज्य सरकार ने इन हितग्राहियों को 2 हजार 78 करोड़ रुपए का लोन वितरित किया है, साथ ही छोटे कारोबारियों को ब्याज के बोझ से मुक्त रखने के लिए अब तक 30 करोड़ रुपए की ब्याज सब्सिडी भी जारी की जा चुकी है, जो मध्यप्रदेश को इस कल्याणकारी योजना में देश का सिरमौर राज्य बनाती है।

जानें क्यों बदला गया सिस्टम

पीएम स्वनिधि योजना को रेहड़ी-पटरी वालों के लिए 'संजीवनी' माना जाता है, लेकिन जमीनी स्तर पर बैंकों द्वारा ब्याज की अग्रिम कटौती (Upfront Deduction) से वेंडर्स को पूरा पैसा नहीं मिल पा रहा था। जिसके बाद हितग्राही इस योजना से दूर हो रहे थे। इसी तकनीकी बाधा को दूर करने और योजना को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए 'स्वनिधि 2.0' वाले बदलाव किए गए हैं।

योजना की 4 बड़ी ताकत

1. बिना गारंटी 'वर्किंग कैपिटल' का सहारा: कोविड-19 की मार झेलने वाले छोटे व्यापारियों के लिए यह योजना बिना किसी गारंटी के 'वर्किंग कैपिटल' (कार्यशील पूंजी) उपलब्ध कराती है। इसमें आपको किसी को जमानत देने या कागज गिरवी रखने की जरूरत नहीं होती।

2. तीन किस्तों में मिलता है लाभ: योजना का ढांचा इस तरह तैयार किया गया है कि जैसे-जैसे आपका कारोबार बढ़े, लोन की राशि भी बढ़ती जाए:

    पहली किस्त: ₹10,000 (कारोबार शुरू करने के लिए)
    दूसरी किस्त: ₹20,000 (पुराना लोन चुकाने पर पात्र)
    तीसरी किस्त: ₹50,000 (समय पर भुगतान करने पर बड़ी मदद)

3. प्रभावी रूप से 'जीरो परसेंट' ब्याज: यह योजना छोटे व्यापारियों पर कर्ज का बोझ नहीं डालती। केंद्र सरकार लोन पर 7% की ब्याज सब्सिडी देती है। मध्यप्रदेश में इससे ऊपर का जितना भी ब्याज बैंक लगाता है, उसका पूरा भुगतान राज्य सरकार करती है। यानी हितग्राही के लिए यह कर्ज पूरी तरह ब्याज मुक्त है।

4. डिजिटल ट्रांजैक्शन पर 'कैशबैक' ईनाम: योजना सिर्फ कर्ज नहीं देती, बल्कि आधुनिक व्यापार से भी जोड़ती है। जो वेंडर्स डिजिटल पेमेंट (UPI/QR Code) का उपयोग करते हैं, उन्हें सरकार की ओर से ₹1200 सालाना तक का कैशबैक सीधे बैंक खाते में दिया जाता है।
समय पर भुगतान और बड़े लाभ

योजना की सबसे अच्छी शर्त यह है कि यदि कोई हितग्राही महज 3 महीने की समय सीमा में लोन की मूल राशि चुका देता है, तो वह तुरंत अगले बड़े लोन (20 हजार और फिर 50 हजार) के लिए पात्र हो जाता है। इससे न केवल उनकी क्रेडिट हिस्ट्री सुधरती है, बल्कि कारोबार के विस्तार के लिए बड़ी पूंजी भी सुनिश्चित होती है।   

योजना में अब तक क्या हो रहा था योजना के तहत मध्य प्रदेश में 32 सरकारी और निजी बैंक लोन बांट रहे थे। नियम के अनुसार, बैंकों को हर तीन महीने में सरकार से ब्याज सब्सिडी की राशि का दावा (क्लेम) करना होता है, जिसे सरकार सीधे हितग्राही के लोन खाते में डीबीटी के माध्यम से ट्रांसफर करती है। लेकिन, ज्यादातर बैंक इस प्रक्रिया का पालन करने के बजाय एक आसान रास्ता अपना रहे थे:

    ब्याज की एडवांस कटौती: बैंक हितग्राही को लोन देते समय ही ब्याज की अनुमानित राशि काटकर शेष रकम देते थे।

    सब्सिडी क्लेम में देरी: वे सरकार से सब्सिडी का क्लेम 6 महीने या उससे भी अधिक समय के बाद करते थे। इस देरी के कारण कई बार हितग्राहियों के लोन अकाउंट बंद हो जाते थे और सब्सिडी की राशि उन तक कभी पहुंच ही नहीं पाती थी।

    हितग्राहियों पर दोहरा बोझ: इससे स्ट्रीट वेंडर्स को न केवल कम लोन राशि मिलती थी, बल्कि वे उस ब्याज को भी चुका रहे थे जिसे सरकार को वहन करना था। इस वजह से उनका योजना के प्रति आक्रोश और उदासीनता बढ़ रही थी। कई हितग्राही 10 हजार का पहला लोन चुकाने के बाद 20 हजार के दूसरे लोन के लिए हतोत्साहित हो रहे थे।

बैंकों की 25% तक की ब्याज दरें, सरकार को नुकसान मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब नगरीय प्रशासन विभाग की समीक्षा में यह तथ्य सामने आया कि कुछ बैंक इस योजना के तहत 24.91% जैसी अत्यधिक ब्याज दरें वसूल रहे थे। यह जनकल्याणकारी योजना के मूल सिद्धांतों के खिलाफ था। इस मुद्दे को लेकर विभाग के अपर आयुक्त ने 13 सितंबर 2024 को केंद्र सरकार को एक पत्र लिखा।

इसमें सुझाव दिया गया कि जिन बैंकों की ब्याज दर 20% से अधिक है, उन्हें योजना से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए या कम से कम 12% से अधिक ब्याज दर वाले बैंकों के लिए नीतिगत निर्णय लिया जाना चाहिए।

केंद्र तक कैसे पहुंचा मामला? बैंकों की मनमानी और योजना की विफलता का यह मामला 2024-25 के बजट की तैयारी के दौरान सामने आया। इसके बाद राज्य सरकार ने विभिन्न स्तरों पर इस मुद्दे को उठाया।

    30 अप्रैल 2024: तत्कालीन नगरीय प्रशासन आयुक्त भरत यादव ने योजना के मिशन डायरेक्टर राहुल कपूर को पत्र लिखकर ब्याज सब्सिडी और पैसा पोर्टल के माध्यम से जारी राशि में भारी अंतर की ओर ध्यान दिलाया।

    अगस्त 2024: नगरीय प्रशासन विभाग ने मिशन डायरेक्टर को फिर से पत्र भेजकर बताया कि बैंक सब्सिडी क्लेम नहीं कर रहे हैं।
    11 नवंबर 2024: मुख्य सचिव अनुराग जैन ने सीधे आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय के सचिव को पत्र लिखकर बैंकों की लापरवाही और योजना की जमीनी हकीकत से अवगत कराया।

इन लगातार प्रयासों के बाद केंद्र सरकार ने मामले का संज्ञान लिया और राज्य सरकार को ब्याज दर पर एक ऊपरी सीमा (अपर कैप) लगाने की सहमति दे दी।

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