THAAD और आयरन डोम को पीछे छोड़ देगा नया एयर डिफेंस सिस्टम, F-35, Su-57, J-35 होंगे नाकाम

नई दिल्ली

ऑपरेशन सिंदूर के बाद एयर डिफेंस सिस्‍टम को आधुनिक बनाने की जरूरत शिद्दत से महसूस हुई. इसके बाद भारत ने मिशन सुदर्शन चक्र बनाने का ऐलान किया. मिशन के तहत DRDO के साथ ही डिफेंस से जुड़ी अन्‍य एजेंसियां मॉडर्न टेक्‍नोलॉजी की मदद से रडार डेवलप करने में जुटी हैं. हाल के दिनों में स्‍टील्‍थ एरियल थ्रेट (5th जेनरेशन फाइटर जेट समेत) का खतरा काफी बढ़ गया है. भारत के पड़ोस में स्थित चीन के पास पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान का बड़ा बेड़ा है. माना जाता है कि चीनी सेना के पास ऐसे ड्रोन सिस्‍टम भी है, जो स्‍टील्‍थ है. बता दें कि स्‍टील्‍थ डिवाइस का रडार क्रॉस सेक्‍शन (RCS) काफी कम होता है, जिस वजह से सामान्‍य रडार या एयर डिफेंस सिस्‍टम के लिए इसे इंटरसेप्‍ट करना काफी मुश्किल है. ऐसे में संघर्ष या युद्ध की स्थिति में दुश्‍मनों को बढ़त मिल जाती है. रूस-यूक्रेन वॉर और इजरायल का गाजा और ईरान पर अटैक के बाद स्‍टील्‍थ वॉर-प्‍लेन, ड्रोन और मिसाइल की डिमांड बढ़ गई है.

ऐसे में दुनिया के तमाम देश पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट और हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल समेत अन्‍य डिफंस इक्विपमेंट डेवलप करने में जुटे हैं. भारत भी इसमें पीछे नहीं रहना चाहता है. एक तरफ 5th जेनरेशन फाइटर जेट डेवलप करने के लिए AMCA प्रोजेक्‍ट लॉन्‍च किया है तो दूसरी तरफ पांचवीं पीढ़ी (स्‍टील्‍थ) के खतरों से निपटने की दिशा में भी लगातार काम किया जा रहा है. इस क्रम में भारत को बड़ी सफलता मिली है. भारत एंटी स्‍टील्‍थ रडार ग्रिड बना रहा है.

भारत की वायु रक्षा प्रणाली जल्द ही एक महत्वपूर्ण तकनीकी बढ़त हासिल करने जा रही है. देश के उभरते एयर डिफेंस आर्किटेक्चर में पैसिव कोहेरेंट लोकेशन रडार (PCLR) को शामिल किया जा रहा है, जिसे अब राष्ट्रीय स्तर के ‘एंटी-स्टेल्थ रडार ग्रिड’ या लो ऑब्ज़र्वेबल डिटेक्शन नेटवर्क (LODN) का अहम हिस्सा माना जा रहा है. इस नेटवर्क का उद्देश्य आधुनिक स्टेल्थ और लो-ऑब्जर्वेबल हवाई खतरों का प्रभावी ढंग से पता लगाना और उन्हें निष्क्रिय करना है. भारत का यह मल्‍टी-लेयर्ड डिटेक्शन फ्रेमवर्क विभिन्न फ्रीक्वेंसी बैंड और डिटेक्शन सिद्धांतों पर आधारित सेंसरों को एक साथ जोड़ता है. इसमें पहले से मौजूद और प्रस्तावित VHF बैंड सर्विलांस रडार, लंबी दूरी के लो-लेवल रडार और वोस्तोक-डी (Vostok-D) जैसे सिस्टम शामिल हैं. PCLR की तैनाती से उन डिटेक्शन गैप्स को भरने में मदद मिलेगी, जिनका फायदा आमतौर पर स्टील्थ एयरक्राफ्ट उठाते हैं. बता दें कि यह सिस्‍टम अमेरिकी THAAD और इजरायली आयरन डोम से एक कदम आगे की बात है. मतलब ये भारतीय एयर डिफेंस सिस्‍टम के सामने बौने हो जाएंगे.

PCLR पारंपरिक रडार सिस्टम से बिल्कुल अलग सिद्धांत पर काम करता है. यह कोई भी रेडियो फ्रीक्वेंसी सिग्नल खुद प्रसारित नहीं करता. इसके बजाय यह वातावरण में पहले से मौजूद सिग्नलों (खासतौर पर कमर्शियल FM रेडियो ब्रॉडकास्ट) का इस्तेमाल करता है. जब कोई हवाई लक्ष्य (Aerial Threat) इन सिग्नलों को बाधित करता है या परावर्तित करता है, तो PCLR उस बदलाव का विश्लेषण कर विमान की मौजूदगी और मूवमेंट का पता लगाता है. इस वजह से यह सिस्टम पूरी तरह से साइलेंट रहते हुए निगरानी करने में सक्षम होता है.

एयर डिफेंस सिस्टम क्या है?
एयर डिफेंस सिस्टम ऐसी सैन्य व्यवस्था है, जिसका मकसद देश की हवाई सीमा में घुसने वाले दुश्मन के लड़ाकू विमानों, मिसाइलों, ड्रोन और अन्य हवाई खतरों का समय रहते पता लगाना और उन्हें नष्ट करना होता है. यह सिस्टम देश के अहम सैन्य ठिकानों, शहरों और नागरिक इलाकों को हवाई हमलों से बचाने का काम करता है.

एयर डिफेंस सिस्टम के मुख्य हिस्से कौन-कौन से होते हैं?
एयर डिफेंस सिस्टम मुख्य रूप से तीन हिस्सों पर आधारित होता है – पहला, रडार और सेंसर, जो हवा में मौजूद किसी भी संदिग्ध वस्तु का पता लगाते हैं. दूसरा, कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम, जो रडार से मिले डेटा का विश्लेषण कर खतरे का आकलन करता है. तीसरा, इंटरसेप्टर हथियार जैसे मिसाइलें या गन सिस्टम, जो दुश्मन के लक्ष्य को मार गिराते हैं.

एयर डिफेंस सिस्टम कैसे काम करता है?
जैसे ही रडार किसी दुश्मन विमान या मिसाइल को पकड़ता है, उसकी गति, दिशा और ऊंचाई की जानकारी कमांड सेंटर को भेजी जाती है. इसके बाद खतरे के स्तर के अनुसार फैसला लिया जाता है कि उसे ट्रैक किया जाए या तुरंत नष्ट किया जाए. जरूरत पड़ने पर एयर डिफेंस मिसाइल दागी जाती है, जो हवा में ही लक्ष्य को नष्ट कर देती है.

भारत के लिए एयर डिफेंस सिस्टम क्यों जरूरी है?
भारत की सीमाएं लंबी हैं और पड़ोसी देशों से सुरक्षा चुनौतियां बनी रहती हैं. आधुनिक युद्ध में मिसाइल और ड्रोन का खतरा तेजी से बढ़ा है. ऐसे में एयर डिफेंस सिस्टम भारत को अचानक होने वाले हवाई हमलों से बचाने, रणनीतिक ठिकानों की सुरक्षा करने और देश की संप्रभुता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है.

भारत में कौन-कौन से प्रमुख एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद हैं?
भारत के पास स्वदेशी और विदेशी तकनीक से बने कई एयर डिफेंस सिस्टम हैं. इनमें आकाश मिसाइल सिस्टम, S-400 ट्रायम्फ, बराक-8 और स्पाइडर जैसे सिस्टम शामिल हैं. ये अलग-अलग ऊंचाई और दूरी पर आने वाले खतरों से निपटने में सक्षम हैं और मिलकर देश की मजबूत हवाई सुरक्षा कवच तैयार करते हैं.

India Anti Stealth Radar Grid: एंटी स्‍टील्‍थ रडार ग्रिड के अस्‍तित्‍व में आने के बाद अमेरिकी F-35, रूसी Su-57 और चीन के J-35 जैसे पांचवी पीढ़ी के विमानों को इंटरसेप्‍ट कर उसके हमले को नाकाम बनाना आसान हो जाएगा. (फाइल फोटो/Reuters)
दुश्‍मन कैसे होंगे चारों खाने चित्‍त?

PCLR को एक पैसिव मल्टीस्टैटिक रडार के रूप में डिजाइन किया गया है. इसमें भौगोलिक रूप से अलग-अलग स्थानों पर लगे रिसीवर एक ही लक्ष्य को विभिन्न कोणों से ट्रैक करते हैं. ‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट के अनुसार, यह स्‍ट्रक्‍चर दुश्मन के लिए सिस्टम को समझना, उसकी लोकेशन पहचानना या उसे निष्क्रिय करना बेहद कठिन बना देती है. चूंकि इसमें कोई एक ट्रांसमीटर नहीं होता, इसलिए इसे दबाने या निशाना बनाने का कोई स्पष्ट बिंदु नहीं होता. इस रडार की एक और बड़ी ताकत इसका लो-फ्रीक्वेंसी सिग्नलों पर निर्भर होना है. आधुनिक स्टील्थ विमान आमतौर पर हाई-फ्रीक्वेंसी रडार से बचने के लिए डिजाइन किए जाते हैं, लेकिन वे लो-फ्रीक्वेंसी बैंड में उतने प्रभावी नहीं होते. इसी कारण PCLR जैसे सिस्टम स्टील्थ प्लेटफॉर्म के खिलाफ ज्यादा कारगर साबित हो सकते हैं.

PCLR का सबसे बड़ा ऑपरेशनल लाभ इसकी पूर्ण पैसिव प्रकृति है. चूंकि यह कोई सिग्नल प्रसारित नहीं करता, इसलिए इसे इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स के जरिए पकड़ना लगभग असंभव होता है. यह एंटी-रेडिएशन मिसाइलों से भी सुरक्षित रहता है, जो आमतौर पर रडार के निकलने वाले सिग्नलों को ट्रैक करके हमला करती हैं. इसके अलावा पारंपरिक जैमिंग तकनीकों का भी इस पर सीमित असर होता है. इसे जाम करने के लिए बड़े पैमाने पर FM ब्रॉडकास्ट बैंड को बाधित करना पड़ेगा, जो तकनीकी रूप से मुश्किल होने के साथ-साथ राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील कदम माना जाएगा.
क्‍यों है खास?

LODN की व्यापक अवधारणा में PCLR को किसी पारंपरिक रडार के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि एक पूरक सेंसर लेयर के रूप में देखा जा रहा है. जहां VHF रडार शुरुआती चेतावनी और प्राथमिक डिटेक्शन देते हैं, वहीं हाई-फ्रीक्वेंसी सिस्टम लक्ष्य की सटीक ट्रैकिंग और हथियार प्रणालियों को क्यू प्रदान करते हैं. PCLR इन सभी के बीच साइलेंट डिटेक्शन और ट्रैक कन्फर्मेशन जोड़ता है, जिससे सेंसर फ्यूज़न के जरिए गलत अलार्म की संभावना कम होती है और डिटेक्शन की विश्वसनीयता बढ़ती है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, PCLR सिस्टम इस समय इंटीग्रेशन ट्रायल्स के दौर से गुजर रहा है. इन परीक्षणों में अन्य रडार सिस्टम के साथ सेंसर फ्यूज़न, कमांड एंड कंट्रोल इंटरफेस और रियल-टाइम ट्रैकिंग क्षमता को परखा जा रहा है. यदि ये ट्रायल्स सफल रहते हैं, तो यह भारत की एयर सर्विलांस क्षमता को वास्तव में नेटवर्क्ड और लेयर्ड सिस्टम में बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा.

 

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