न पुतिन न ट्रंप, इस बार कौन होगा रिपब्लिक डे का चीफ गेस्ट? PM मोदी ने किसे दिया न्योता और क्यों

नई दिल्ली

एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा और उर्सुला वॉन डेर लेयेन भारत के 77वें गणतंत्र दिवस पर यही दो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं. इस बार न रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन आ रहे हैं, न अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप. इसके बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसा न्योता दिया है, जो भारत के कूटनीतिक इतिहास में पहली बार हो रहा है. पहली बार किसी एक देश के नेता को नहीं बल्कि यूरोपीय संघ (EU) के दो शीर्ष नेताओं को एक साथ रिपब्लिक डे का चीफ गेस्ट बनाया गया है. यह फैसला सिर्फ परंपरा तोड़ने वाला नहीं बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत की रणनीतिक सोच को भी दिखाता है.

रिपोर्ट के अनुसार यह न्योता ऐसे समय दिया गया है जब दुनिया की राजनीति तेजी से बदल रही है. अमेरिका और ट्रांसअटलांटिक रिश्तों में खटास बढ़ी है. अमेरिका और यूरोप के बीच भरोसे की दरार खुलकर सामने आ रही है. इसी बीच भारत और यूरोपीय संघ एक-दूसरे के और करीब आ रहे हैं. भारत-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर बातचीत निर्णायक मोड़ पर है. रक्षा, सुरक्षा, क्लीन एनर्जी और सप्लाई चेन जैसे मुद्दों पर साझेदारी गहरी हो रही है. ऐसे में EU के दोनों शीर्ष नेताओं को एक साथ न्योता देना भारत का बड़ा कूटनीतिक दांव माना जा रहा है.

कौन हैं एंटोनियो कोस्टा और उर्सुला वॉन डेर लेयेन?

एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष हैं, जबकि उर्सुला वॉन डेर लेयेन यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष हैं. ये दोनों पद EU की सबसे ताकतवर संस्थाओं का नेतृत्व करते हैं. 27 देशों के इस समूह में नीतिगत फैसलों से लेकर वैश्विक रणनीति तक, इन दोनों की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है.

क्यों खास है यह न्योता? पहली बार हुआ ऐसा

भारत के इतिहास में अब तक रिपब्लिक डे पर किसी एक देश के नेता को ही मुख्य अतिथि बनाया गया है. इस बार तस्वीर बदली है. EU को एक इकाई के रूप में मान्यता देना, अपने आप में बड़ा संकेत है. यह दिखाता है कि भारत अब द्विपक्षीय रिश्तों से आगे बढ़कर ब्लॉक-लेवल डिप्लोमेसी को भी उतनी ही अहमियत दे रहा है.
ट्रंप फैक्टर और बदलते वैश्विक समीकरण

डोनाल्ड ट्रंप जबसे दोबारा सत्ता में आए तबसे अमेरिका-यूरोप रिश्ते फिर तनाव में हैं. NATO, व्यापार और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मतभेद बढ़े हैं. EU ऐसे समय में भारत को एक भरोसेमंद, स्थिर और उभरते वैश्विक साझेदार के तौर पर देख रहा है. भारत भी पश्चिमी देशों के साथ संतुलन बनाते हुए अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखना चाहता है.

इस दौरे का पूरा शेड्यूल क्या है?

    25 जनवरी को दोनों नेता भारत पहुंचेंगे.
    राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात करेंगे.
    26 जनवरी को रिपब्लिक डे परेड में चीफ गेस्ट होंगे.
    27 जनवरी को 16वें भारत-EU शिखर सम्मेलन की सह-अध्यक्षता करेंगे.
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रतिनिधिमंडल स्तर की बातचीत होगी.
    भारत-EU बिजनेस फोरम भी आयोजित होगा.

भारत-EU FTA क्यों बना सबसे बड़ा एजेंडा?

भारत और EU के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर बातचीत 2007 से चल रही है. दिसंबर 2025 में इसे नई रफ्तार मिली. अब इसे अंतिम चरण में माना जा रहा है. EU भारत को चीन पर निर्भरता कम करने के विकल्प के तौर पर देखता है, जबकि भारत को यूरोपीय बाजार, टेक्नोलॉजी और निवेश की ज़रूरत है.

इस दौरे से क्या-क्या निकल सकता है?

    भारत-EU FTA पर बड़ा ब्रेकथ्रू.
    डिफेंस और सिक्योरिटी पार्टनरशिप का औपचारिक ऐलान.
    ग्रीन एनर्जी, हाइड्रोजन और क्लीन टेक्नोलॉजी में सहयोग.
    सप्लाई चेन डाइवर्सिफिकेशन में भारत की भूमिका मजबूत.
    वैश्विक नियम-आधारित व्यवस्था की संयुक्त पैरवी.

क्यों कहा जा रहा है इसे बड़ा कूटनीतिक दांव?

EU ने हाल ही में भारत के लिए नई स्ट्रैटेजिक एजेंडा तैयार की है. वहीं भारत भी EU को सिर्फ देशों के समूह के तौर पर नहीं, बल्कि एक रणनीतिक शक्ति के रूप में देखने लगा है. इस दौर में यह न्योता बताता है कि भारत वैश्विक राजनीति में सिर्फ संतुलन नहीं, बल्कि दिशा तय करने की भूमिका में आ चुका है.

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