होली और वसंत पंचमी के त्योहार का रंगों से है गहरा नाता

नई दिल्ली.

भारत त्योहारों का देश है और यहां हर मौसम का अपना एक उत्सव है। साल 2026 में 23 जनवरी को वसंत पंचमी का पर्व मनाया जाएगा। यह दिन न केवल विद्या की देवी मां सरस्वती की आराधना के लिए खास है, बल्कि यह उस उमंग की भी शुरुआत है, जिसका इंतजार हर सनातनी को होता है- यानी 'होली'।

ब्रज में होली की दस्तक आमतौर पर लोग समझते हैं कि होली फाल्गुन मास में खेली जाती है, लेकिन मथुरा और वृंदावन में इसकी तैयारी बहुत पहले शुरू हो जाती है। ब्रज की प्राचीन स्थानीय परंपराओं के अनुसार, वसंत पंचमी के दिन ही मंदिरों में 'होली का डांढा' गाड़ा जाता है। यह एक धार्मिक संकेत है कि अब अगले 40 दिनों तक ब्रज की गलियों में गुलाल उड़ेगा। बांके बिहारी मंदिर में इस दिन ठाकुर जी को विशेष रूप से गुलाल अर्पित किया जाता है और वहीं से होली के उत्सव का आधिकारिक आगाज माना जाता है।

मां सरस्वती का प्राकट्य दिवस
पौराणिक कथाओं और शास्त्रों में वर्णित है कि माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ही ब्रह्मा जी ने अपनी मानस पुत्री सरस्वती को प्रकट किया था। जब सृष्टि की रचना हुई थी, तब चारों ओर मौन व्याप्त था। देवी के प्रकट होने और उनकी वीणा बजने के साथ ही संसार को वाणी, संगीत और बुद्धि प्राप्त हुई। यही कारण है कि विद्यारंभ संस्कार के लिए इस दिन को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के जानकार बताते हैं कि इस दिन छोटे बच्चों को पहला अक्षर सिखाना उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभ होता है।

पीले रंग का मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व
वसंत पंचमी के दिन पीले रंग का विशेष महत्व है। आयुर्वेद और रंग विज्ञान के अनुसार, पीला रंग स्फूर्ति, मानसिक शांति और एकाग्रता का प्रतीक माना जाता है। वसंत ऋतु में प्रकृति भी सरसों के खेतों के माध्यम से पीले रंग की चादर ओढ़ लेती है। इस दिन मां सरस्वती को पीले पुष्प और पीले मीठे चावल अर्पित करने की परंपरा है, जो जीवन में सात्विकता और समृद्धि का संचार करती है।

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