नसीमुद्दीन सिद्दीकी का बड़ा कदम: कांग्रेस छोड़, चंद्रशेखर से गठजोड़ की अटकलें

लखनऊ 

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा से पहले कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है. कांग्रेस से नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने इस्तीफा दे दिया है. नसीमुद्दीन पहले बहुजन समाजवादी (बीएसपी) पार्टी में थे. लेकिन, उन्होंने बीएसपी छोड़कर कांग्रेस ज्वाइन किया था. अब उन्होंने कांग्रेस से भी अलविदा कह दिया है. उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का बेहद करीबी माना जाता है.

अपने बयान में उन्होंने कहा कि वह कांग्रेस में अपने सभी साथियों के साथ इसलिए शामिल हुए थे कि जातिवाद और संप्रदायवाद के साथ हो रहे अन्याय की लड़ाई लड़ी जा सके। लेकिन कांग्रेस में यह लड़ाई नहीं लड़ पा रहा हूं। 
इसलिए इस्तीफा दे दिया है।  उन्होंने कहा कि जल्द ही नई शुरुआत की जाएगी। नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा कि कांग्रेस के किसी भी पदाधिकारी से कोई शिकायत नहीं है लेकिन जिस काम के लिए वह पार्टी में आए थे वह नहीं हो पा रहा है। उन्होंने कहा कि उनके साथ इस्तीफा देने वाले सभी लोगों से मशविरा किया जा रहा है। जिस तरफ सहमति बनेगी उसी दल के साथ मिलकर आगे जनता की लड़ाई लड़ी जाएगी। पूर्व मंत्री के साथ करीब 72 अन्य लोगों ने पार्टी छोड़ दी है। इसमें करीब दो दर्जन पूर्व विधायक भी शामिल हैं।  

क्यों छोड़ा ‘हाथ’ का साथ?
इस्तीफे के बाद जारी अपने बयान में नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा, ‘मैं कांग्रेस में अपने साथियों के साथ इसलिए शामिल हुआ था ताकि जातिवाद और संप्रदायवाद के खिलाफ हो रहे अन्याय की लड़ाई मजबूती से लड़ी जा सके. लेकिन कांग्रेस में रहते हुए मैं यह लड़ाई नहीं लड़ पा रहा हूं. मेरा मकसद जनता के लिए काम करना है, जो यहां पूरा नहीं हो पा रहा था.’

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें कांग्रेस के किसी भी पदाधिकारी से व्यक्तिगत शिकायत नहीं है, बल्कि यह निर्णय सैद्धांतिक है. सिद्दीकी ने संकेत दिया कि वे जल्द ही अपने समर्थकों के साथ मशविरा कर नई राजनीतिक पारी की शुरुआत करेंगे.

नसीमुद्दीन सिद्दीकी का राजनीतिक सफर
नसीमुद्दीन सिद्दीकी मूल रूप से बांदा जिले के स्योंढ़ा गांव के रहने वाले हैं. उनका राजनीतिक सफर 1988 में बांदा नगर पालिका अध्यक्ष पद के चुनाव से शुरू हुआ. हालांकि इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, जिसके बाद उन्होंने बसपा ज्वाइन की.
1991 में बसपा के टिकट से नसीमुद्दीन ने बांदा सदर सीट से विधायक का चुनाव जीतकर इतिहास रचा. वे न केवल बांदा के पहले मुस्लिम विधायक बने, बल्कि धीरे-धीरे मायावती के खास और भरोसेमंद नेता भी बन गए. 2007 में जब बसपा की सरकार बनी, तब उनकी राजनीतिक मजबूती और प्रशासनिक क्षमता के कारण उन्हें ‘मिनी मुख्यमंत्री’ भी कहा गया.

नसीमुद्दीन का खेलों से जुड़ाव
राजनीति में आने से पहले नसीमुद्दीन का झुकाव खेलों की ओर था. वे राष्ट्रीय स्तर के वॉलीबाल खिलाड़ी रह चुके हैं. इसके अलावा उन्होंने रेलवे में कॉन्ट्रैक्टर के रूप में भी काम किया. उनके खेल और व्यवसाय का अनुभव बाद में राजनीतिक नेतृत्व और निर्णय क्षमता में भी मददगार साबित हुआ. जिसने उन्हें पूरे राज्य में एक कद्दावर नेता के रूप एम पहचान दिलाई.

कैबिनेट मंत्री बनने का सफर
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने बसपा सरकार में कई महत्वपूर्ण पद संभाले. जब मायावती 1995 में पहली बार मुख्यमंत्री बनीं, तब उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया. इसके बाद 21 मार्च 1997 से 21 सितंबर 1997 तक शॉर्ट टर्म गवर्नमेंट में मंत्री रहे. 3 मई 2002 से 29 अगस्त 2003 तक एक साल के लिए वे फिर कैबिनेट का हिस्सा रहे. इसके बाद 13 मई 2007 से 7 मार्च 2012 तक फुल टाइम गवर्नमेंट में मंत्री रहे. उनकी नीतियों और प्रभाव के कारण उन्हें पश्चिमी यूपी में एक मजबूत नेता माना जाता था.

चुनावी रिकॉर्ड और परिवार का सियासी रसूख
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अपने करियर में चुनावी राजनीति से ज्यादा संगठन और सदन के भीतर अपनी पकड़ मजबूत रखी. पिछले दो दशकों से वे विधान परिषद सदस्य (MLC) रहे हैं. उनकी पत्नी हुस्ना सिद्दीकी भी पांच साल तक एमएलसी रहीं. उनके बेटे अफजल सिद्दीकी ने 2014 में फतेहपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था. दिलचस्प बात यह है कि रसूख बढ़ने के साथ ही उनके परिवार में भी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं जागीं, जिसे लेकर बाद में कुछ विवाद भी हुए. सिद्दीकी ने बताया कि पार्टी ने उन्हें चुनाव लड़ने का ऑफर दिया था, लेकिन अब उनकी इच्छा चुनाव लड़ने की नहीं बल्कि प्रत्याशियों को जिताने के लिए प्रचार करने की है.

कांग्रेस में एंट्री के बाद अब इस्तीफा
नसीमुद्दीन ने फरवरी 2018 में बसपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा था. जहां उन्होंने पश्चिमी यूपी में प्रांतीय अध्यक्ष पद संभाला. हालांकि अब उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देकर अपने राजनीतिक सफर में नई दिशा का संकेत दिया है. उनका यह कदम क्षेत्रीय सियासत और पार्टी की रणनीति में चर्चा का विषय बना हुआ है.

अब आगे क्या?
बसपा से निष्कासन के बाद कांग्रेस में शामिल हुए सिद्दीकी का अब कांग्रेस छोड़ना यूपी की राजनीति में नए समीकरण बना सकता है. चर्चा है कि वे अपनी पुरानी पार्टी बसपा में वापसी कर सकते हैं या फिर समाजवादी पार्टी का दामन थाम सकते हैं. हालांकि, उन्होंने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं और कहा है कि “जहां समर्थकों की सहमति होगी, वहीं से जनता की लड़ाई लड़ेंगे.”

 

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