दिल्ली के एक वरिष्ठ वकील ने मनमोहन सिंह के प्रस्तावित स्मारक का विरोध किया, क्या दलीलें

नई दिल्ली
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के निधन के बाद उनके अंतिम संस्कार और स्मारक को लेकर राजनीति तेज है। इस बीच दिल्ली के एक वरिष्ठ वकील ने मनमोहन सिंह के प्रस्तावित स्मारक का विरोध किया है। कई चर्चित केसों की पैरवी करने वाले अश्विनी उपाध्याय ने मनमोहन सिंह की सरकार में हुए घोटालों और कुछ अन्य फैसलों का जिक्र करते हुए स्मारक बनाए जाने का विरोध किया है। केंद्र सरकार ऐलान कर चुकी है कि उचित स्थान का चुनाव करके मनमोहन सिंह का स्मारक बनाया जाएगा।

समान शिक्षा, समान नागरिक संहिता, धर्मांतरण नियंत्रण, जनसंख्या नियंत्रण जैसे मुद्दों पर अक्सर हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई लड़ने वाले अश्विनी उपाध्याय ने एक्स पर एक वीडियो शेयर किया जिसमें वह कई दलीलों के साथ मनमोहन सिंह के सम्मान और स्मारक पर सवाल उठाते दिख रहे हैं। उन्होंने कहा, 'सम्मान किसका होना चाहिए और समाधि स्थल किसका बनना चाहिए, क्या उस व्यक्ति का सम्मान होना चाहिए जिसके 10 साल के शासन में 10 लाख लाख करोड़ का घोटाला हो गया। 70 हजार करोड़ का कॉमनवेल्थ घोटाला, एक लाख 76 हजार करोड़ का टूजी घोटाला, अगर आप पूरा देखें 2004 से लगभग 10 लाख करोड़ का घोटाला होगा। और भी बहुत सारे घोटाले।'

उपाध्याय ने नेशनल माइनॉरिटी एजुकेशन ऐक्ट का जिक्र करते हुए भी मनमोहन सिंह के सम्मान और स्मारक का विरोध किया है। उन्होंने कहा, 'क्या उस व्यक्ति का सम्मान होना चाहिए और समाधि स्थल बनना चाहिए, जिसने संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए 2004 में एक नेशनल माइनॉरिटी एजुकेशन ऐक्ट बनाया और भारत में समुदाय विशेष को फायदा देने के लिए स्कूल-कॉलेजों को उनको माइनॉरिटी स्टेटस देना शुरू कर दिया।'

वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि पहली बार भारत में माइनॉरिटी अफेयर मिनिस्ट्री 2006 में बनी है उसके पहले तक केवल सोशल जस्टिस मिनिस्ट्री हुआ करती थी जिसको कहते थे सामाजिक न्याय मंत्रालय। सभी गरीबों का कल्याण उसी के जरिए होता था। लेकिन 2006 में पहली बार रहमान खान साहब को अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री बनाया गया और ये काम किया गया था केवल तुष्टिकरण के लिए। क्या वो व्यक्ति सम्मान का अधिकारी है जिसने 2010 में विदेशी फंडिंग कराने के लिए एफसीआरए कानून बनाया जो, ये जो एफसीआरए कानून 2010 में बनाया गया था केवल और केवल भारत विरोधी माओवादियों, नक्सलियों, जिहादी मिशनरियों को फंडिंग कराने के लिए बनाया गया था। उसके बाद यहां एनजीओस की भरमार हो गई।

उपाध्याय ने आगे कहा, 'क्या उस व्यक्ति को सम्मान मिलना चाहिए जिसने 2012 में राइट टू एजुकेशन ऐक्ट को बदल के मदरसों को इसके दायरे से बाहर कर दिया। जब राइट टु एजुकेशन ऐक्ट बना था तो मदरसे भी इसके दायरे में थे। लेकिन 2012 में इस कानून में संशोधन किया गया। नतीजा ये है कि मदरसे में कौन पढ़ा रहा है, मदरसे में क्या पढ़ाया जा रहा है, ये सरकारी अधिकारी जा के ऑडिट नहीं कर सकते और यह किसके कहने पर किया गया था, जमीयत उलेमा हिंद और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कहने पर, प्रधानमंत्री कौन मनमोहन सिंह, क्या उनका सम्मान होना चाहिए।'

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