भारतीय ज्ञान परंपरा को सहेजने वाला अग्रणी संस्थान है सप्रे संग्रहालय – मंत्री परमार

सप्रे संग्रहालय के अलंकरण समारोह में दर्जन भर से ज्यादा विभूतियां सम्मानित

भारतीय ज्ञान परंपरा को सहेजने वाला अग्रणी संस्थान है सप्रे संग्रहालय – मंत्री परमार

 मंत्री परमार ने कहा  माधवराव सप्रे जी जैसे ज्ञानी महापुरुष सदियों में होते हैं, उन्होंने अपने जीवन काल में अनेक विद्वान गढ़े

भोपाल
उच्च शिक्षा मंत्री इंदरसिंह परमार ने कहा है कि माधवराव सप्रे जी जैसे ज्ञानी महापुरुष सदियों में होते हैं। उन्होंने अपने जीवन काल में अनेक विद्वान गढ़े हैं। यह सभी विद्वान भारतीय ज्ञान परंपरा का ही हिस्सा हैं। इस तरह कह सकते हैं कि सप्रे जी की स्मृति में स्थापित यह संग्रहालय उसी ज्ञान परंपरा को सहेजे हुए हैं।

मंत्री परमार मंगलवार को सप्रे संग्रहालय के अलंकरण समारोह में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के कुलगुरु आचार्य डॉ. एसके जैन ने की। समारोह में पत्रकारिता, मीडिया शिक्षा और जनसंपर्क क्षेत्र की करीब दर्जन भर से ज्यादा प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया।

मंत्री परमार ने कहा कि संग्रहालय में आने का यह पहला अवसर है, अब तक इसके बारे में सुना ही था। यहां आकर अहसास हुआ कि यहां संजोई गई सामग्री शोधार्थियों के लिए बहुत उपयोगी है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के जो विश्वविद्यालय यहां से संबद्ध नहीं है उन्हें भी इस संस्थान से जोड़ा जायेगा, ताकि विद्यार्थी इसका लाभ उठा सकें। उन्होंने कहा कि सप्रे जी के व्यक्तित्व से नई पीढ़ी को परिचित करवाने के लिए उन्हें पाठ्यक्रम में शामिल कराने के प्रयास होंगे।उन्होंने कहा कि भारत विश्व गुरु रहा है, लेकिन सदियों पहले षडयंत्रपूर्वक भारतीय ज्ञान परंपरा को खारिज किया गया। दु:ख की बात है कि आजादी के बाद भी हमारी इस परंपरा के गौरव को पुर्नस्थापित करने की तरफ ध्यान नहीं दिया गया। लेकिन नई शिक्षा नीति में इस तरह के प्रयास किये जा रहे हैं कि आने वाली पीढ़ी यह जान सके कि दुनिया में जिस ज्ञान की खोज के दावे किये जाते हैं, वह भारत सदियों पहले ही जान चुका था।

कुलगुरु आचार्य एसके जैन ने कहा कि भले ही आज डिजिटल का युग है, लेकिन इस माध्यम की भी एक सीमा है। लेकिन पुस्तकों में जो ज्ञान संपदा छुपी हुई है वह अनंत है। सप्रे संग्रहालय में जो दुर्लभ सामग्री है वह इसी संपदा का अंग है। उन्होंने कहा कि भारत में शोध की असीम संभावना है। सप्रे संग्रहालय जैसे संस्थान इस संभावना की प्रतिपूर्ति में महती भूमिका निभाते हैं।

वर्ष 2047 तक भारत पुन: बनेगा विश्व गुरु

मंत्री परमार ने कहा कि नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में मप्र आगे रहा है। देश में ऐसे प्रयास हो रहें कि वर्ष 2030 तक यह पद्धति तैयार हो जाये। इसके दस साल बाद अर्थात 2040 तक यह संपूर्ण रूप से आकार ग्रहण कर लेगी तथा 2047 तक पूरे देश में लागू हो जायेगी। इसके बाद भारत विश्व गुरु बनने की दिशा में बढ़ चलेगा।

सम्मानित विभूतियों की ओर से प्रति उत्तर में ‘हुक्मचंद नारद सम्मान’ से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार अतुल तारे ने कहा कि इस सम्मान ने हममें दायित्व बोध जगाया है। हम जिन विभूतियों के नाम से यहां सम्मानित हुये हैं उनकी गरिमा बनी रहे यह हमारे प्रयास होंगे। यह सम्मान हमारे लिए प्रेरक का कार्य करेगा। उन्होंने सप्रे संग्रहालय को एक व्यक्ति की संकल्पशक्ति का परिणाम बतलाया। आरंभ में संग्रहालय के संस्थापक निदेशक विजयदत्त श्रीधर ने स्वागत् वक्तव्य देते हुए कहा कि सप्रे संग्रहालय के पास पांच करोड़ पृष्ठों से ज्यादा की सामग्री है तथा करीब सवा लाख किताबें हैं। इसके बल पर पूरे विश्व में अपनी पहचान कायम की है।

समारोह में वरिष्ठ पत्रकार अतुल तारे को ‘हुक्मचंद नारद सम्मान’, प्रतिष्ठित आचार्य डा. पवित्र श्रीवास्तव, प्राध्यापक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय तथा डा. अनु श्रीवास्तव, प्राध्यापक एल.एन.सी.टी. विश्वविद्यालय को ‘मीडिया शिक्षा सम्मान’से सम्मानित किया गया। ‘ *संतोष कुमार शुक्ल पुरस्कार’ जनसंपर्क अधिकारी राजेश पाण्डेय को प्रदान किया गया।

प्रतिभावान पत्रकारों में ’माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार‘ मनोज जोशी, ‘लाल बलदेव सिंह पुरस्कार’ दक्षा वैदकर, ‘जगदीशप्रसाद चतुर्वेदी पुरस्कार’ सारिका ठाकुर, ‘रामेश्वर गुरु पुरस्कार’ के लिए दिनेश शुक्ल तथा झाबरमल्ल शर्मा पुरस्कार आशीष दुबे को प्रदान किया गया। इसी तरह प्रकाश भोमरकर एवं रामचन्द्र पाण्डेय को ‘जगत पाठक पुरस्कार’, मुकेश विश्वकर्मा को ‘सुरेश खरे पुरस्कार’ और फोटो जर्नलिस्ट अनिल दीक्षित को ‘होमी ब्यारावाला पुरस्कार’ प्रदान किया गया।

 

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